Articles discussing उत्तराध्ययन
Pracheen Jainagamon mein Charvakadarshan ka Prastutikaran evam Samiksha
Sagarmal Jain · Sambodhi, 2004
“उत्तराध्ययन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ये सांसारिक विषय ही हमारे प्रत्यक्ष के विषय हैं । परलोक જો તો हमने देखा ही नहीं । वर्तमान के काम- भोग हस्तगत हैं जबकि भविष्य में मिलने वाले (स्वर्ग-सुख) अनागत अर्थात् संदिग्ध हैं”
साधना के आधार बिंदु
आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2001
संतुलन का सेतु है अनेकांत
Jain Bharati, 2001