Articles discussing तुलसी
निर्धूम दीप की अप्रकप लौ
Jain Bharati, 2001
“जब आचार्यश्री तुलसी ने अपनी सदेहावस्था મેં अपने यशस्वी उत्तराधिकारी युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर जैन इतिहास में एक विलक्षण अध्याय की संरचना की, तब हजारों-लाखें निगाहें अजीब-सी हलचल 44 के साथ विस्मय के महासागर मैं इबकियां लगा રહી थीं”
कालचक्र और जेनरेशन-गेप
साध्वी श्रुतयशा · Jain Bharati, 2000
स्वाध्याय: चेतना विकास का सूत्र
मुनि मदनकुमार · Jain Bharati, 2001