Articles discussing न्यायसूत्र
नैयायिक ज्ञान का साधन प्रत्यक्ष प्रमाण
Hemlata Srivastava · Sambodhi, 2006
“गौतम ने न्यायसूत्र में प्रत्यक्ष को परिभाषित करते हुए कहा है कि प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षोत्पन्न ज्ञान है जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवसायात्मक होता है।”
वैशेषिक दर्शन में दुःख का स्वरूप तथा प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण की महत्ता
Dharmachand Jain · Sambodhi, 2018
आचार्य प्रभाचन्द्र के ग्रन्थों में 'तर्क प्रमाण' की अवधारणा
डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 2010