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जैन दर्शन

18 articles in the archive discuss जैन दर्शन, from Sambodhi, Jain Vidya, Jain Bharati and other journals (1990–2018). Open any article for its summary, citation and original PDF.

18 articles

Articles discussing जैन दर्शन

  1. अनेकान्तवाद : सिद्धान्त और व्यवहार

    Deepak Ranjan · Sambodhi, 2009

    “अनेकान्तवाद जैन दर्शन की तत्त्वमीमांसा का आधारभूत सिद्धान्त है । यह चिन्तन की एक ऐसी अवधारणा है जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों के माध्यम से किए गए चिन्तन से निगमित सिद्धान्तों का समन्वयात्मक रूप उपलब्ध होता”
  2. अनेकान्त के प्रतिष्ठापक आचार्य अकलंकदेव

    डॉ. अशोककुमार जैन · Jain Vidya, 1999

  3. आत्मतत्त्व : एक समन्वयात्मक विमर्श

    सन्तोष आचार्य · Jain Bharati, 2001

    “लगभग समस्त वैदिक भारतीय दर्शनों में आत्मतत्त्व के अस्तित्व को मान्यता प्राप्त है। अवैदिक दर्शनों में केवल जैन दर्शन में ही आत्मतत्त्व की सत्ता स्वीकार की जाती है।”
  4. स्वातंत्र्य चेतना : जैन चितन

    साध्वी श्रुतयशा · Jain Bharati, 2000

    “जैन दर्शन ने अस्तित्व के स्तर पर भी आत्म स्वातंत्र्य ` को प्रतिष्ठापित જિયા | છોટે से छोटा प्राणी भी अपना पृथक् ओर स्वतंत्र अस्तित्व रखता है”
  5. भारतीय कर्मवाद - लौकिक का आध्यात्मिक रूपांतरण

    Jain Bharati, 2001

  6. Karm ka Bhotik Swarup

    Mahaveer Raj Gelda · Sambodhi, 2003

    “जैन दर्शन ने जीव और जगत के वैविध्य का कारण कर्म को स्वीकार लिया । भगवती सूत्र में भगवाम महावीर कहते हैं जीव कर्म के द्वार विभक्ति भाव अर्थात्‌ विभिन्नता को प्राप्त होता हैं ।'”
  7. अ'ग सूत्र 'आचार'- सापेक्ष जीवसिद्धि गुरू विचक्षण पदज

    Guru Vichakshana Padaraj - Sadhvi Surekha · Sambodhi, 1990

  8. नय, अनेकांत ओर स्याद्वाद

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  9. आचार्य अमृतचंद्र सूरि रचित लघुतत्व स्फोट और उसका वैशिष्ट्य

    Bhagchand Jain 'Bhagendu' · Jnana Desana, 2008

    “जैन दर्शन में स्याद्वाद की दृष्टि से इस प्रकार का कथन किया जाता है जिसमें कोई विरोध नहीं आता”
  10. प्राचार्य कुन्दकुन्द की देन

    डां° देवेन्द्कुमार शास्त्री · Jain Vidya, 1990

  11. आचार्य कुन्दकुन्द: निश्चय और व्यवहार

    Jain Vidya, 1990

  12. सप्ततत्त्व

    Jain Vidya, 1991

  13. वैशेषिक दर्शन में दुःख का स्वरूप तथा प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण की महत्ता

    Dharmachand Jain · Sambodhi, 2018

  14. संयम की बात बजरिए भूकंप

    Jain Bharati, 2001

  15. अनेकातवाद ओर न्याय की अवधारणा

    प्रो. टी. भट्टाचार्य · Jain Bharati, 2000

  16. अहिंसा : चेतना का पुनराविष्कार

    (डॉ.) निर्वाणप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001

    “जैन दर्शन में दृष्टिकोण या विचार परिवर्तन या भाव परिवर्तन की एक विशिष्ट वैज्ञानिक प्रायोगिक प्रक्रिया है--अनुप्रेक्षा।”
  17. कुन्दकुन्द का वस्तु-स्वातन्त्रय-सिद्धान्त

    राजकुमार छाबड़ा · Jain Vidya, 1990

  18. आचार्य प्रभाचन्द्र के ग्रन्थों में 'तर्क प्रमाण' की अवधारणा

    डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 2010

    “जैन दर्शन द्वारा मान्य प्रत्यक्ष का एक चरण ईहा है तथा यह व्यापि सम्बन्ध के ज्ञान हेतु स्वीकृत तर्क प्रमाण नहीं है।”