Articles discussing समयसार
समयसार की रचना में आचार्य कुन्दुकुन्द की दृष्टि
पं० बंशीघर व्याकरणाचाय · Jain Vidya, 1990
“1--समयसार का श्रालोडन करने से मैं इस निष्कषं पर पहुँचा हूं कि उसकी रचना श्राचाय॑ कुन्दकुन्द ने इस दृष्टि से की है कि सम्पूरं मानवसमष्टि उसे पढ़कर उसके श्रमिप्राय' को समभे श्रौर उस श्रमिप्रायके अनुसार श्रपनी जीवन-प्रद्त्तियों को नैतिकरूप देने का दृढ़ संकल्प જરે जिससै वह जीवत જે श्र॑त तक सुखपूवेक जिन्दा रह सके”
कुन्दकुन्द का वस्तु-स्वातन्त्रय-सिद्धान्त
राजकुमार छाबड़ा · Jain Vidya, 1990
कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों में सम्यग्चारित्र की अवधारणा
डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 1990
आचार्य कुन्दकुन्द की ग्रन्थत्रयी के टीकाकार
डां० शुद्धात्मप्रभा · Jain Vidya, 1990
“समयसार कुन्दकुन्द की एक ऐसी श्रेष्ठ रचना है जो विगत दो हजार वर्षों से जैनसन्तों का मामंदशंन करती AT रही है ।”
कुन्दकुन्द साहित्य में समकालीन सांस्कृतिक जीवन की भांकियां
प्राचार्य कुन्दकुन्द की देन
आचार्य कुन्दकुन्द: निश्चय और व्यवहार
Jain Vidya, 1990
दार्शनिक व्याख्याता कुन्दकुन्दाचार्य के विचार और विवेचना
डॉ. झादित्य प्रचण्डिया · Jain Vidya, 1990
मूलसंघाग्रणी मुनीदवर कुन्दकुन्दाचार्य
डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन · Jain Vidya, 1990
द्रव्य-पर्यायात्मक वस्तु ज्ञान का विषय
डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 1999
अष्टपाहुड और जैन साधु
डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 2013
इस अंक के सहयोगी रचनाकार
डॉ० उदयचंद जैन · Jain Vidya, 1990
तत्त्वार्थराजवार्तिक और कर्मबन्ध के प्रत्यय
अनेकांत का फलित नयवाद
कुमार अनेकान्त जैन · Jain Bharati, 2001
आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा प्रतिपादित अमृतकुम्भ और विषकुम्भ
पं° जगन्मोहनलाल शास्त्री · Jain Vidya, 1990
आगम और आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भ्रमणाचार
Shreyanshkumar Jain · Jnana Desana, 2010
पुण्य मीमांसा
मुनि रमेशकुमार · Jain Bharati, 2001
परमप्पयासु में बंध-मोक्ष संबंधी विचार
Jain Vidya, 1988
कुन्दकुन्द-साहित्य का साहित्यिक मूल्यांकन
डॉ. राजाराम जैन · Jain Vidya, 1990
प्रवचनसार का सार
डॉ. प्रेमचन्द रॉवका · Jain Vidya, 1990
आचार्य कुन्दकुन्द और यथार्थ - प्रसद् भृत व्यवहारनय
Jain Vidya, 1990
आचार्य कुन्दकुन्द कृत 'अष्टपाहुड' में 'जीवन-मूल्य'
डॉ. प्रेमचन्द्र रांवका · Jain Vidya, 2013