Articles discussing भावपाहुड
अष्टपाहुड और जैन साधु
डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 2013
“जिनमार्ग मे भावचिह की प्रधानता प्रतिपादित करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने -भावपाहुड' મેં कहा कि पहले मिथ्यात्व आदि दोषों को छोड़कर भाव से अतरग नग्न होकर शुद्धात्मा का श्रद्धान, ज्ञान एवं आचरण करे पश्चात् द्रव्य સે बाह्य मुनिमुद्रा (लिंग) प्रकट करे, यही जिनाज्ञा एवं मोक्षमार्ग है”
कुन्दकुन्द साहित्य में समकालीन सांस्कृतिक जीवन की भांकियां
कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों में सम्यग्चारित्र की अवधारणा
डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 1990
अष्टपाहुड : एक विहंगावलोकन
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल · Jain Vidya, 2013
अष्टपाहुडों का काव्यशास्त्रीय अध्ययन
डॉ. उदयचन्द्र जैन · Jain Vidya, 2013
मुनिराज ही जिनबिम्ब एवं जिनप्रतिमा
दर्शनपाहुड : एक अध्ययन
डॉ. कस्तूरचन्द जैन “सुमन” · Jain Vidya, 2013
कुन्दकुन्द-साहित्य का साहित्यिक मूल्यांकन
डॉ. राजाराम जैन · Jain Vidya, 1990