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आचार्य कुन्दकुन्द

23 articles in the archive discuss आचार्य कुन्दकुन्द, from Jain Vidya, Jain Bharati, Jnana Desana and other journals (1993–2018). Open any article for its summary, citation and original PDF.

23 articles

Articles discussing आचार्य कुन्दकुन्द

  1. आचार्य श्री कुन्दकुन्द एवं उनका दर्शनपाहुड

    डॉ. कुलदीपकुमार · Jain Vidya, 2013

    “आचार्य कुन्दकुन्द और उनके साहित्य ने भारतीय दर्शनशास्त्र को भी एक महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान किया है, जिसका मूल्यांकन अनेक विद्वानों ने अपने ग्रन्थो में मुक्त-कण्ठ से किया है।”
  2. अष्टपाहुड में श्रमण और श्रमणाभास

    डॉ. (कु.) आराधना जैन · Jain Vidya, 2013

    “आचार्य कुन्दकुन्द ने अष्टपाहुड मे श्रमण के यथार्थ स्वरूप का दिग्दर्शन कराया है।”
  3. अष्टपाहुडों का काव्यशास्त्रीय अध्ययन

    डॉ. उदयचन्द्र जैन · Jain Vidya, 2013

    “आचार्य कुन्दकुन्द एक ऐसे ही परमागम के रचनाकार हैं जिनके काव्य "पाहुड रूप में प्रसिद्ध ह। 'पाहुड' सिद्धान्त જે उपहार हैं, सिद्धान्त के स्वरूप का प्रतिपादन करनेवाले काव्य हैं।”
  4. आचार्य कुन्दकुन्द कृत 'अष्टपाहुड' में 'जीवन-मूल्य'

    डॉ. प्रेमचन्द्र रांवका · Jain Vidya, 2013

  5. अष्टपाहुड और जैन साधु

    डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 2013

    “आचार्य कुन्दकुन्द ने इन चिह्ों के अलावा अन्य चिह्नों को जिनेतर (कुलिग) कहा है।”
  6. सम्पादकीय

    डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 2013

    “आध्यात्मिक क्षेत्र में आचार्य कुन्दकुन्द का “दर्शनपाहुड' एक बहुत ही क्रान्तिकारी रचना है।”
  7. जैन अध्यात्म योग का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ : मोक्षपाहुड

    डॉ. अनेकान्तकुमार जैन · Jain Vidya, 2013

    “समयसार आदि परमागमों का प्रणयन करनेवाले परम योगी आचार्य कुन्दकुन्द ने ईसा की पहली शती में इस ग्रन्थ का प्रणयन ‘योगियों’ को सावधान करने के लिए किया था।”
  8. दर्शनपाहुड : एक अध्ययन

    डॉ. कस्तूरचन्द जैन “सुमन” · Jain Vidya, 2013

    “आचार्य कुन्दकुन्द ने सर्वप्रथम મોક્ષ के प्रमुख साधनरूप दर्शन-सम्यग्दर्शन का स्वरूप समझाया।”
  9. मुनिराज ही जिनबिम्ब एवं जिनप्रतिमा

    डॉ. (श्रीमती) कुसुम पटोरिया · Jain Vidya, 2013

    “जिनप्रतिमा का अर्थ तीर्थकर की पाषाणादि निर्मित प्रतिमा लिया जाता है। आचार्य कुन्दकुन्ददेव मुनि की चलती-फिरती देह को હી जिनमार्ग में कही हुई जिनप्रतिमा कहते हैं।”
  10. आचार्य श्री प्रभाचन्द्र का व्यक्तित्व और कर्तृत्व

    डॉ. गुलाबचन्द जैन · Jain Vidya, 2010

  11. एक में अनेक : विराट व्यक्तित्व के धनी आचार्य प्रभाचन्द्र

    डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 2010

  12. पण्डित आशाधरजी द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली और उनकी विवेचना

    डॉ. संजीव प्रचण्डया ' सोमेन्द्र' · Jain Vidya, 2001

  13. अष्टपाहुड : एक विहंगावलोकन

    डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल · Jain Vidya, 2013

    “पाँच सौ तीन गाथाओं में निबद्ध एवं आठ पाहुडों में विभक्त यह अष्टपाहुड ग्रंथ मूलसंघ के पट्टाचार्य कठोर प्रशासक आचार्य कुन्दकुन्द की एक ऐसी अमर कृति है जो दो हजार वर्षों से लगातार शिथिलाचार के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाती चली आ रही है।”
  14. स्वामी समन्तभद्र और उनकी यशोगाथाएं

    श्री कुन्दनलाल जैन · Jain Vidya, 1996

    “जैन वाङ्मय के इतिहास-गगन મેં आचार्य कुन्दकुन्द और आचार्य गृद्धपिच्छ उमास्वामि के पश्चात् स्वामी समन्तभद्राचार्य ही एक ऐसे बहुश्रुत और क्रान्तिकारी दिग्गज मनीषी दिखाई देते हैं जो प्रखर प्रतिभा - पञ्ज तेजस्वी सूर्य की भांति देदीप्यमान प्रतीत होते”
  15. सम्पादकीय

    डॉ. हीरालाल जैन, आचार्य अमितगति, आशाधर, पण्डित प्रभाचन्द्र, आचार्य शिवार्य, शिवकोटि, डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन, अपराजित सूरि, श्री विजय, देवसेन, ब्रहमने · Jain Vidya, 2011

  16. पुण्य मीमांसा

    मुनि रमेशकुमार · Jain Bharati, 2001

  17. मूलाचार की टीकाएँ एवं उनकी पाण्डुलिपियाँ

    Prem Suman Jain · Jnana Desana, 2008

  18. सल्लेखना के परिप्रेक्य परिप्रेक्ष्य में आहार ग्रहण और त्याग का महत्व

    Rakesh Jain · Jnana Desana, 2011

  19. कलिकाल गणधर : आचार्य समन्तभद्र

    डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 1996

  20. पंचस्तूपान्वयी भट्टारक श्री वीरसेन स्वामी

    श्री कुन्दनलाल जैन · Jain Vidya, 1993

  21. पण्डित श्री आशाधरजी कौ दृष्टि में 'अध्यात्म-योग-विद्या'

    डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल · Jain Vidya, 2001

  22. सिद्धान्तचक्रवर्ती के 'गोम्मटसार' का कर्मकाण्ड : कर्मसिद्धान्त का प्रामाणिक सन्दर्भ

    विद्यावाचस्पति डॉ. श्रीरंजनसूरिदेव, आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती · Jain Vidya, 1997

  23. अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता

    Veersagar Jain · Sambodhi, 2018