Articles discussing अष्टपाहुड
आचार्य कुन्दकुन्द कृत 'अष्टपाहुड' में 'जीवन-मूल्य'
डॉ. प्रेमचन्द्र रांवका · Jain Vidya, 2013
“अष्टपाहुड में निबद्ध साहित्य श्रमण व श्रावक/साधु व गृहस्थ दोनों के हितार्थ प्रशस्त मार्ग का निदर्शन है।”
अष्टपाहुड : एक विहंगावलोकन
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल · Jain Vidya, 2013
“पाँच सौ तीन गाथाओं में निबद्ध एवं आठ पाहुडों में विभक्त यह अष्टपाहुड ग्रंथ मूलसंघ के पट्टाचार्य कठोर प्रशासक आचार्य कुन्दकुन्द की एक ऐसी अमर कृति है जो दो हजार वर्षों से लगातार शिथिलाचार के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाती चली आ रही है।”
सम्पादकीय
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 2013
““अष्टपाहुड' मे दंसणपाहुड, सुत्तपाहुड, चारित्रपाहुड, बोहपाहुड, भावपाहुड, मोक्खपाहुड, लिंगपाहुड और सीलपाहुड - ये आठ पाहुड नाम के अनुसार अपने-अपने विषय की विशुद्ध आत्मस्वरूप की दृष्टि को दिखलाते”
दर्शनपाहुड : एक अध्ययन
डॉ. कस्तूरचन्द जैन “सुमन” · Jain Vidya, 2013
“दर्शनपाहुड की चौंतीसर्वी गाथा से प्रतीत होता है कि अष्टपाहुड की रचना मानवजाति के उत्थान लिए की गयी थी।”
आचार्य कुन्दकुन्द एवं बोधपाहुड
पं. भ्रनूपचन्द न्यायतीथं · Jain Vidya, 1990