अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता
Summary
वीरसागर जैन इस लेख में तत्त्वज्ञान की निर्मलता के लिए अन्य दर्शनों का ज्ञान आवश्यक बताते हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन भारत में विद्वान केवल अपने मत का अध्ययन नहीं करते थे बल्कि विरोधी मतों को भी समझते थे, क्योंकि शास्त्रों में पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष की पद्धति अपनाई जाती थी। पूर्व पक्ष में प्रतिपक्षी दर्शन की मान्यताओं को सुस्पष्ट रूप से रखा जाता था और उत्तर पक्ष में उनका खण्डन करके अपना सिद्धान्त स्थापित किया जाता था। यदि अध्ययनकर्ता पूर्व पक्ष को समझे बिना उत्तर पक्ष पढ़े तो तर्क और निष्कर्ष सही प्रकार से ग्रहण नहीं कर सकता। लेखक विभिन्न सूत्रों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि एक‑एक पद में विभिन्न दर्शनों की मान्यताओं का खण्डन निहित होता है, इसलिए अन्य मतों का ज्ञान आवश्यक है। वे इस मानसिकता की आलोचना करते हैं कि दूसरे दर्शन का अध्ययन समय की बर्बादी है। लेख का संदेश है कि बौद्ध, सांख्य, न्याय, वेदान्त, जैन इत्यादि सभी दर्शनों का परस्पर अध्ययन दर्शनिक दृष्टि की व्यापकता और सहनशीलता को बढ़ाता है।
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Conclusion
लेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अन्य दर्शनों का ज्ञान न केवल अपने दर्शन की गहन समझ के लिए आवश्यक है बल्कि यह विचार‑विमर्श को समृद्ध और समन्वित बनाता है। दर्शनशास्त्र में वैचारिक उदारता और परस्पर अध्ययन की परम्परा पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।