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श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्‌: एक समीक्षा

By Hemvati Nandan Sharma

Vol. 41Dec-18pp. 138–144Hindi

Summary

हेमवती नन्दन शर्मा द्वारा रचित यह समीक्षा ग्रन्थकार आचार्य रमाकान्त उपाध्याय के महाकाव्य 'श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्' पर केन्द्रित है। यह महाकाव्य स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन पर आधारित है और बीस सर्गों में विभक्त है। शर्मा सबसे पहले कवि के जीवन और पृष्ठभूमि का परिचय देते हैं—रमाकान्त उपाध्याय उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के झों आरा गाँव में जन्मे, विद्वान और वैदिक परम्परा के अनुयायी थे। समीक्षा में महाकाव्य की संरचना, कथानक और भाषा‑शैली का विश्लेषण किया गया है। प्रत्येक सर्ग में दयानन्द के जन्म, शिक्षण, मांस‑मदिरा के विरोध, बालविवाह और मूर्ति‑पूजा के खण्डन, शास्त्रार्थ और समाजसुधार के प्रयासों का वर्णन है। लेखक रस‑विमर्श का विस्तृत विश्लेषण करते हैं; काव्य में श्रृंगार, वीर, करुण आदि रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती है परन्तु स्वामी दयानन्द के तेजस्वी और सुधारक व्यक्तित्व के कारण वीर रस की प्रधानता है। शर्मा छन्द योजना, अलंकार, उपमा और दृष्टान्तों की चर्चा करते हैं और महाकाव्य के काव्यगत गुणों को रेखांकित करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि महाकाव्य में कथ्य और शैली का संतुलन है; ऐतिहासिक तथ्यों को poetic मुक्तता के साथ पिरोया गया है। लेख का निष्कर्ष है कि ‘श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्’ हिन्दी साहित्य में जीवन‑चरित महाकाव्यों की परम्परा को समृद्ध करता है और दयानन्द सरस्वती के आदर्शों का प्रभावी चित्रण प्रस्तुत करता है।

AI-generated summary, automatically checked against the article text.

Conclusion

समीक्षा से स्पष्ट होता है कि 'श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्' केवल एक जीवनकथा नहीं बल्कि समाजसुधार और वैदिक पुनर्जागरण का घोष है। इसकी भाषा, शैली और रस योजना इसे हिन्दी महाकाव्य साहित्य में विशेष स्थान देती हैं।

Key passages

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  • “श्रीदयानन्दचरितमहाकाव्यम् बीस सर्गों में विभक्त है | इस महाकाव्य के प्रणेता आचार्य रमाकान्त उपाध्याय ने इन बीस सर्गों के अन्तर्गत विद्यातीर्थ महाकवि महर्षि दयानन्द के पावन जन्म का वर्णन, उनके व्याकरण, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन શ્રી दयानन्दजी के द्वारा पशु, पक्षी आदि मांस भक्षण एवं मदिरा पानी की अत्यन्त निंदा के साथ बालविवाह, मूरतिपूजन आदि कुप्रथाओं का खण्डन, पंडितों से शाख्र वाद-विवाद, अन्य कुमतों का खण्डन एवं वेदोक्त मंत्रों की प्रमाणिक व्याख्या, हिमालय, हरिद्वार, गंगादि वंदनीय स्थानों का वर्णन किया”
  • “प्रबोध्यवंशो विवमौ गुरुणाम् ॥ गुरुवंश यह उपदेश देकर शोभित हुआ कि जीव नित्य है, प्रकृति भी नित्य है और संसार का कारण ईश्वर भी नित्य है परन्तु संसार अनित्य और विकारी है”

Works cited in this article

  1. काव्यालंकारसार संग्रह-उद्भट ४/४
  2. दशरूपक - ४/८१
  3. श्रीदयानन्दचरितमहाकाव्यम् ५/४४
  4. श्रीदयानन्दचरितमहाकाव्यम् २/५४
  5. श्रीदयानन्दचरितमहाकाव्यम्ू ४/९९

Discussed in this article

People

  • श्रीदयानन्द
  • आचार्य रमाकान्त उपाध्याय
  • हेमवती नन्दन शर्मा
  • दण्डी 4
  • मम्मट
  • भरत 12
  • वामन
  • उद्भट
  • पं. विश्वनाथ
  • जगन्नाथ
  • आनन्दवर्धन
  • विद्यातीर्थ महाकवि महर्षि दयानन्द

Places

  • सुल्तानपुर
  • झों आरा

Texts & works

  • श्रीदयानन्दचरितमहाकाव्यम्

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Vol. 41
1–10Reflections on Manuscriptology: Forays into Indian Paradigms of Knowledge ManagementDipti Tripathi11–26Kathakautukam: Sanskrit rendering of Persian Yusuf‑Zulaykha of JamiBalram Shukla27–35Consciousness in Philosophy of Advaita, Viśiṣṭādvaita, Dvaita and Śaivism with synoptic view of other philosophical traditionsSushim Dubey36–40A Note on Murari’s version of the Rama‑StoryCharulata Verma41–64Plant Propagation as described in Sanskrit TextsDhananjay Vasudeo Dwivedi65–78The Jains in AhmedabadJitendra B. Shah79–85वैशेषिक दर्शन में दुःख का स्वरूप तथा प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण की महत्ताDharmachand Jain86–90आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ : एक परिचयSadhvishree Priyashubhanjanashree91–103ब्रह्मकारणतावाद एवं सृष्टि : एक आलोचनाSureshwar Meher104–108अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकताVeersagar Jain109–117लिङ्गपुराण का योगदर्शनSatyavrat Verma118–137संस्कृत तथा फारसी के क्रियापदों में साम्यMohit Kumar Mishra138–144श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्‌: एक समीक्षाHemvati Nandan SharmaCurrent article145–154मुसव्विरी के मुकाम और राजस्थानJyoti Kumawat155–162कांगड़ा शैली में नायिका‑भेद अंकनRitika Garg163–168लोक कला के नये मुहावरे गढ़ते : यामिनी राय के चित्रRajendra Prasad169–176आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ और मनोविज्ञानSadhvishree Priyashubhanjanashree177–187ભારતીય તત્ત્વજ્ઞાનની રૂપરેખાSukhlalji Sanghavi188–205શ્રુતસાધનામાં સાધ્વીજી ભગવંતોનું પ્રદાનMuni Vairagyarativijay Gani206–211રઘુવિલાસમાં નિરૂપિત જીવનબોધBhailalbhai G. Patel212–216જૈન સંપ્રદાયમાં "સ્તવન"નું માહાત્મ્યBhagwan S. Choudhary217–243પુરાતત્ત્વાચાર્ય મુનિ શ્રી જિનવિજયજી (૨૭, જાન્યુ. ૧૮૮૮ – ૩, જૂન ૧૯૭૬)Ramesh Oza

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