लिङ्गपुराण का योगदर्शन
Summary
सत्यब्रत वर्मा इस लेख में लिङ्गपुराण में वर्णित योगदर्शन का विश्लेषण करते हैं। वे बताते हैं कि पुराणों में पंचलक्षण के अतिरिक्त भी अनेक विषय समाविष्ट हैं और लिङ्गपुराण में दार्शनिक तत्वों के साथ योग का विस्तृत निरूपण मिलता है। लेख में पुराणेतर सामग्री के समावेश का कारण बताते हुए लेखक कहते हैं कि सम्पादकों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए धर्म, नीति, समाज, कला और दर्शन से जुड़ी सामग्री जोड़ी। लिङ्गपुराण में योग साधना का उद्देश्य परमात्म तत्व का ज्ञान बताया गया है, जो चित्त की एकाग्रता से सम्भव है और यह एकाग्रता शिव के अनुग्रह से प्राप्त होती है। लेखक सांख्य और योग के साम्य की चर्चा करते हुए कहते हैं कि लिङ्गपुराण का योगदर्शन पारम्परिक ग्रंथों से प्रेरित है परन्तु इसमें कुछ नवीनता भी है। योग का वर्णन करते समय इसमें चित्त की वृत्तियों का निरोध, यम‑नियम, प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि की चर्चा है। लेख के अनुसार लिङ्गपुराण योग को शिवोपासना से जोड़ता है और भक्तिपरक तत्वों को महत्व देता है।
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Conclusion
यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि लिङ्गपुराण योगदर्शन को वैदिक और शैव परम्पराओं का संगम मानता है। इसमें शास्त्रीय योग की प्रक्रिया को शिवभक्ति के साथ जोड़ा गया है, जिससे साधक के लिए परमात्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।