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ब्रह्मकारणतावाद एवं सृष्टि : एक आलोचना

By Sureshwar Meher

Vol. 41Dec-18pp. 91–103Hindi

Summary

सुरेश्वर मेहेर का यह लेख शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के उस सिद्धान्त की आलोचना करता है जिसमें ब्रह्म को जगत का एकमात्र कारण माना गया है। लेखक सबसे पहले ब्रह्म की परिभाषा देते हैं जिसके अनुसार ब्रह्म वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान सत्ता है जिससे नाम‑रूपात्मक जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होती है। शंकर का मत है कि ब्रह्म असंग, निर्विकारी और निष्क्रिय है; जगत मात्र मायिक प्रपंच है जिसका ब्रह्म से कोई वास्तविक संबंध नहीं। मेहेर इस अद्वैतवादी दृष्टिकोण की समीक्षा करते हुए कहते हैं कि यदि ब्रह्म और जगत में अनन्यत्व है तो कारण‑कार्य संबंध कैसे समझें। वे शंकर के विवर्तवाद—जिसमें जगत ब्रह्म का प्रतिविम्ब माना गया है—पर प्रश्न उठाते हैं और विचार करते हैं कि ब्रह्म में कार्य की इच्छा और उत्पत्ति का संसर्ग कैसे सम्भव है। लेख में वैष्णव और न्याय दर्शनों के विचारों का भी संकेत किया गया है, जिनमें जगत को वास्तविक माना गया है और ईश्वर को उपादान तथा निमित्त कारण के रूप में स्वीकार किया गया है। लेखक का निष्कर्ष है कि ब्रह्मकारणतावाद की दार्शनिक जटिलताएँ इसे तर्कसंगत सिद्ध नहीं करतीं और सृष्टि की समझ के लिए बहुलवादी दृष्टि आवश्यक है।

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Conclusion

लेख दर्शाता है कि शंकराचार्य का ब्रह्मकारणतावाद कई दार्शनिक कठिनाइयों से घिरा है। ब्रह्म को निर्विकारी मानते हुए भी उसे जगत का कारण मानना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। सृष्टि की व्याख्या में बहुलवादी दृष्टिकोण अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

Key passages

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  • “उपर्युक्त आलोचना से यह स्पष्टत ज्ञात होता है कि यद्यपि अद्वैत-वेदान्त दर्शन भारतीय दार्शनिक संप्रदायों में स्वकीय स्वतन्त्र मौलिक विचारधारा के कारण एक उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित है, तथापि इस दर्शन के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मकारणतावाद एवं सृष्टि सिद्धान्त वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण से पूर्णतया संपुष्ट व स्वीकृत नहीं हो पा रहे”
  • “शंकराचार्य ने अपने शारीरकभाष्यादि ग्रन्थों में प्रस्तुत समन्वयात्मक सिद्धान्त के आधार पर की है।”
  • “अतः जगत् की उत्पत्ति आदि की इच्छा भी मायाविशिष्ट ब्रह्म में ही है।”

Works cited in this article

  1. वेदान्तसार, सदानन्द योगीन्द्र, अनु. सत्यनारायण श्रीवास्तव, सुदर्शन प्रकाशन, इलाहाबाद, २०००, पुनर्मुद्रण
  2. ईशादि नौ उपनिषद्, गीता प्रेस, गोरखपुर, २०००, पुनर्मुद्रण
  3. माण्डूक्यकारिका (गौड़पादकारिका), भाष्यसहित, गीता प्रेस, गोरखपुर, २००४, पुनर्मुद्रण
  4. वेदान्तपरिभाषा, धर्मराजाध्वरीन्द्र, 'प्रकाश' हिन्दी व्याख्या, गजानन शास्त्री मुसलगांवकर, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, २०००, पुनर्मुद्रण
  5. सर्वदर्शनसंग्रह, माधवाचार्य, संपा. उमाशंकर शर्मा 'ऋषि', चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, १९९८

Discussed in this article

People

  • शंकराचार्य 8
  • सुरेश्वर मेहेर
  • सदानन्द योगीन्द्र
  • धर्मराजाध्वरीन्द्र
  • विद्यारण्य
  • वाचस्पतिमिश्र 4
  • महर्षि बादरायण
  • पद्मपाद
  • सर्वज्ञात्म मुनि
  • मधुसूदन सरस्वती

Texts & works

Dynasties, sects & groups

  • अद्वैतवेदान्त

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