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कुन्दकुन्द

16 articles in the archive discuss कुन्दकुन्द, from Jain Vidya, Jnana Desana, Sambodhi and other journals (1987–2011). Open any article for its summary, citation and original PDF.

16 articles

Articles discussing कुन्दकुन्द

  1. कुन्दकुन्द साहित्य में समकालीन सांस्कृतिक जीवन की भांकियां

    डॉ. (श्रीमती) विद्यावती जैन · Jain Vidya, 1990

    “प्राच्य-मारतीय भूगोल की दृष्टि से भी वह कम महत्त्वपुरण नहीं । यह ध्यातव्य है कि શ્રાચાર્ય कुन्दकुन्द ने परम्परा-प्राप्त जैन तीथे-भुमियों के रूप में जिस भारतीय भूगोलकी जानकारी दी है वह ईसा की प्रथम शताब्दी का है।”
  2. आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में समय

    डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1990

    “तीर्थकर महावीर જી दुंदूमि के स्वर તો गुंजित होते ही रहे ત્રો? उससे मोहाच्छन संसारी जीवों को नया प्रकाश AT जीवन-दान भिला पर कालानुसार उसे व्यवस्थित प्रौर व्याख्यायित करने का श्रेय कुन्दकुन्द को ही जाता है इसलिए उनके नाम से एक विशिष्ट श्राम्नाय भी प्रारम्भ हुई है जिसका सम्बन्ध जैनधमं की मूल-परम्परा श्रौर विशुद्ध भ्रध्यात्म से रहा है”
  3. कुन्दकुन्द का वस्तु-स्वातन्त्रय-सिद्धान्त

    राजकुमार छाबड़ा · Jain Vidya, 1990

  4. कुन्दकुन्द-साहित्य का साहित्यिक मूल्यांकन

    डॉ. राजाराम जैन · Jain Vidya, 1990

    “झाचार्य कुन्दकुन्द को केवल श्रध्यात्मी सन्त कवि मानकर उनके विराट् व्यक्तित्व को सीमित करना उपयुक्त नहीं”
  5. कुन्दङ्कन्द साहित्य में सर्वज्ञ का स्वरूप

    पण्डित रतनचन्द भारित्ल · Jain Vidya, 1990

  6. जैनदर्शन की व्यावहारिकता

    Veersagar Jain · Jnana Desana, 2011

  7. समयसार में निश्चय-व्यवहार-विषयक चर्चा-समाधान

    नाथूराम डोंगरीय · Jain Vidya, 1990

  8. जैन दार्शनिक साहित्य में ज्ञान और प्रमाण के समन्वय का प्रश्न

    Kanjibhai M. Patel · Sambodhi, 2009

  9. प्रकाशकीय

    Jain Vidya, 1990

  10. योगीन्दुदेव और हिन्दी संत-परम्परा

    डॉ. भागचन्द जैन · Jain Vidya, 1988

    “મ્રાચાર્ય योगीन्दु श्रपध्रंश साहित्य के कुन्दकुन्द हैं जिन्होने શ્રવ્યાત્યક્ષેત્ર को नया प्रायाम दिया है श्रौर दर्शन की परिसीमा को विस्तृत किया है।”
  11. अध्यात्म-साधक योगीन्दु और कबीर

    डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1988

  12. प्रास्ताविक

    Jain Vidya, 1991

  13. अकलंकदेव कृत पुण्य और पाप का विवेचन

    डॉ. सूरजमुखी जैन · Jain Vidya, 1999

  14. प्रवचनसार में शुद्धोपयोग की महिमा एवं उस संबंधी गाथाओं का व्याकरणिक विश्लेषण

    डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1990

  15. अनेकांत का फलित नयवाद

    कुमार अनेकान्त जैन · Jain Bharati, 2001

  16. प्रकाशकीय

    Jain Vidya, 1987