Articles discussing जैनविद्या
षट्खण्डागम और धवला में मार्गणास्थान की अवधारणा
डॉ. राजवीरसिंह शेखावत · Jain Vidya, 1993
जैनधर्म के मर्मज्ञ : श्री वीरसेनाचार्य
श्री वीरसेनाचार्य, श्री कन्हैयालाल · Jain Vidya, 1993
अकलंकदेव कृत पुण्य और पाप का विवेचन
डॉ. सूरजमुखी जैन · Jain Vidya, 1999
प्रवचनसार में शुद्धोपयोग की महिमा एवं उस संबंधी गाथाओं का व्याकरणिक विश्लेषण
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1990
सुदंसणचरिउ के मूल्यात्मक प्रसंग - एक व्याकरणिक विश्लेषण
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1987
हेमचन्द्र-अपभ्रन्श-व्याकरण सूत्र-विवेचन
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1987
समयसार की रचना में आचार्य कुन्दुकुन्द की दृष्टि
पं० बंशीघर व्याकरणाचाय · Jain Vidya, 1990
जंबसामिचरिउ के यशस्वी महाकवि वीर का व्यक्तित्व
डॉ. महेन्द्रसागर प्रचंडिया · Jain Vidya, 1987
प्रास्ताविक
Jain Vidya, 1988
सम्पादकीय
Jain Vidya, 1999
भविसयत्तकहा में युग और समाज के संदर्भ
डं° रामगोपाल शर्मा “दिनेश · Jain Vidya, 1986
आरम्भिक
Jain Vidya, 1985
प्रकाशकीय
Jain Vidya, 1988
प्रकाशकीय
Jain Vidya, 1991
“अरब तक जैनविद्या के विशेषांकों द्वारा स्वयंभु, पुष्पदन्त, घनपाल, वीर, मुनिनयनन्दि, कनकामर, योगीन्दु भ्रौर प्नाचायं कुन्दकुन्द के जीवन, दर्शन और साहित्य पर प्रकाश डाला जाः चुका है”
प्रकाशकीय
Jain Vidya, 1990
भविसयत्तकहा का कथारूप
Jain Vidya, 1986