Articles discussing जैन
सम्पादकीय
Jain Vidya, 1999
“अकलंकदेव दर्शनशास्त्र के गूढ़ अध्येता થે | उन्होने षट्दर्शन का गंभीर अध्ययन -चिन्तन कर तर्क और युक्ति से जैन-दर्शन की श्रेष्ठता, समीचीनता और आत्मकल्याण हेतु उसकी उपादेयता सशक्तरूप से सिद्ध की”
जैन ग्रंथों एवं विज्ञान में पुद् गल
Prabhat Kumar Jain, Rani Jain · Jnana Desana, 2010
““पुद्गलः शब्द जैन दर्षन का पारिभाषिक शब्द है। जो वर्ण, स्पर्ष, T और रस - इन गुणों से युक्त है, वह पुद्गल”
षट्खण्डागम और धवला में मार्गणास्थान की अवधारणा
डॉ. राजवीरसिंह शेखावत · Jain Vidya, 1993
“जैन दर्शन में मान्य जीव વા आत्मा अनेक हैं ,जो तत्त्वतः समान हैं , किन्तु कर्म -पुद्गल के संयोग से उनके गुणों अथवा शक्तियों के विकास में न्युनाधिक्य पाया जाता है”
पण्डितप्रवर आशाधर के सागारधर्मामृत की प्रमुख विशेषताएं
डॉ. रमेशचन्द जैन · Jain Vidya, 2001
आचार्य कुन्दकुन्द: निश्चय और व्यवहार
Jain Vidya, 1990
“जैनदर्शन में उस श्राध्यात्मिक भ्रनुभव को व्यक्त करने के लिए जिस शैली का उपयोग किया गया है उसे हम A% शैली कहते हैं”
मिथ्यात्व खण्डन - धर्मपरीक्षा की आधारभूमि
Jain Vidya, 1993
“ग्धमेपरीक्षाः एकं व्यंग्य-प्रधान काव्य है जिसमैं श्राघायों ते एकान्तवादो कथाओं श्रौर विचारों का खण्डन जैन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में बड़े ही सुन्दर ढंग से किया है”
दार्शनिक व्याख्याता कुन्दकुन्दाचार्य के विचार और विवेचना
डॉ. झादित्य प्रचण्डिया · Jain Vidya, 1990
Hemacandra’s Pramana-Mimamsa - Some Striking Features
Sagarmal Jain · Sambodhi, 1989
आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में समय
डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1990
“तीर्थकर महावीर જી दुंदूमि के स्वर તો गुंजित होते ही रहे ત્રો? उससे मोहाच्छन संसारी जीवों को नया प्रकाश AT जीवन-दान भिला पर कालानुसार उसे व्यवस्थित प्रौर व्याख्यायित करने का श्रेय कुन्दकुन्द को ही जाता है इसलिए उनके नाम से एक विशिष्ट श्राम्नाय भी प्रारम्भ हुई है जिसका सम्बन्ध जैनधमं की मूल-परम्परा श्रौर विशुद्ध भ्रध्यात्म से रहा है”
नैयायिक ज्ञान का साधन प्रत्यक्ष प्रमाण
Hemlata Srivastava · Sambodhi, 2006
आचार्य अमितगति और हरिषेण की धर्मपरीक्षा एक तुलनात्मक अध्ययन
डॉ. मागचन्द जन 'मास्कर' · Jain Vidya, 1993
युगदृष्टा उपाध्याय मुनि ज्ञानसागरजी
उपाध्याय मुनि ज्ञानसागरजी · Jnana Desana, 2011
“मध्यप्रदेश स्थित मुरैना में पचास वर्ष पूर्व 1 मई सन् 1957 જો श्री शांतिलालजी जैन की धर्मपत्नि श्रीमती अशर्फीदिवी की कोख से होनहार बालक उमेश ने जन्म लिया, जो कि सोनागिरि મેં 05.11.1976 को क्षुल्लक गुणसागर बने”
ख्यातिवाद : प्रमेयकमलमार्तण्ड के प्रकाश में
डॉ. वीरसागर जैन · Jain Vidya, 2010
““ख्यातिवाद' प्रायः सभी भारतीय दर्शनों का एक प्रमुख विषय है, परन्तु जैन ग्रन्थों में इसका विस्तृत विवचेन मात्र प्रभाचन्द्राचार्य के 'प्रमेयकमलमार्त्ततड' एवं न्यायकुमुदचन्द्र में ही देखने को मिलता”
अनेकांत: सामाजिक अभिप्राय
शुभू पटवा · Jain Bharati, 2001
“जैन धर्म का धरातल भारत-भूमि है, बेशक भारत से बाहर भी यह फैला है, फलवान होता जा रहा”
समय की कसौटी पर सिद्ध वास्तु शास्त्र
Acharya Ashok Sahajanand · Jnana Desana, 2010
कर्मशास्त्र और मनोविज्ञान
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000
आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में मुक्ति तत्त्व
डॉ. प्रेमसागर जैन · Jain Vidya, 1990
आयुर्वेद की एक पाण्डुलिपि - वैद्यमनोत्सव
Anupam Jain, Br. Rajni Jain · Jnana Desana, 2010
अहिंसा-ब्रह्मचर्य : दैहिक विमर्श
आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2001
अहिंसा की सामाजिक ताकत
नंद चतुर्वेदी · Jain Bharati, 2000
शाकाहार का मर्म
Jain Bharati, 2000
“मांसाहार के साथ जीवहिंसा की क्रूरता जुड़ी हुई है और जीवहिंसा करने वाला व्यक्ति कभी भी संवेदनशील इंसान नहीं हो सकता। जैन तो हो ही नहीं सकता।”
धम्मो दीवों पड़ट्ठाण
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
ध्यान - योग : जैन सन्दर्भ
Acharya Ashok Sahajanand · Jnana Desana, 2011
“जैन ग्रंथों में भी 'योग' की महत्ता को स्वीकार किया गया है।”
जाणई - पासइ
Harnarayan U. Pandya · Sambodhi, 1990
“इन समस्त तथ्यों के आयार पर यह स्वीकार करना होगा कि भारत में जैन आगमिक तह में 'जानाति' और 'पश्यति' शब्द एक ओर सामान्य अर्थ में प्रयुक्त द्वोते वे तथा 'धरी ओर बे एक दूसरे से मिन्न अथ' के वाचक भी ये।”
आरम्भिक
Jain Vidya, 1985
“भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य की विभिन्न विधाश्रों की श्रीवृद्धि में जैनाचायों, गृहस्थ विद्वानों, त्यागियों, ब्रतियों ग्रादि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।”
जंबूसामिचरिउ में छन्द-योजना
Jain Vidya, 1987
कविमनीषी योगीन्दु का काव्यशास्त्रीय मूल्यांकन
Jain Vidya, 1988
“जैन कवियों का दृष्टिकोण पुरुष के पुरुषाथं चतुष्ट्य की चरम सीमा જો स्पशं करता है । किसी भी काव्यरूप में रचा गया काव्य का सार-सारांश मोक्ष की श्रोर उन्मुख होता है”
संतुलन का सेतु है अनेकांत
Jain Bharati, 2001
जसहरचरिउ में श्रात्मा सम्बन्धी विचार
धीर्यांशकुमार सिघई · Jain Vidya, 1985
व्यक्तित्व विकास की चाबी
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000
कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों में सम्यग्चारित्र की अवधारणा
डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 1990
कषाय विवेचना
Jain Bharati, 2001
अप्प दीपो भव
वीरेन्द्रकुमार जैन · Jain Bharati, 2001
समाधि : चैतन्य का अनुभव
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
हिंसा की जड़े
सच्चिदानन्द सिन्हा · Jain Bharati, 2001
बंधनमुक्ति-पर्व
Jain Bharati, 2000
आत्म-नियंत्रण से कषाय-मुक्ति
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
एक्का मणुस्सजाई
Jain Bharati, 2001
प्रास्ताविक
Jain Vidya, 1988
अहिंसक समाज के सूत्र
Jain Bharati, 2001
गांधी और जनतंत्र
जैनेन्द्र कुमार · Jain Bharati, 2001
प्रकाशकीय
कपूरचन्द पाटनी · Jain Vidya, 1985
पुण्य मीमांसा
मुनि रमेशकुमार · Jain Bharati, 2001
महाकवि पुष्पदंत और उनकी रसाभिव्यक्ति
डॉं० प्रेमचंद रांवका · Jain Vidya, 1985
“जैन श्रपश्च श-परम्परा में धार्मिक भावना विरहित काव्य की कल्पना नहीं की जा सकती”
अमितगति श्रावकाचार में पदस्थ ध्यान और शरीर के शक्तिकेन्द्र
डॉ. सोहनलाल देवोत · Jain Vidya, 1993
मैत्री : दृष्टि का रूपांतरण
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000
इनाम
जैनेन्द्र कुमार · Jain Bharati, 2000
स्वाध्याय : ज्ञान की कुंजी
डॉ. प्रेम सुमन जैन · Jain Bharati, 2000
पुरुषार्थं और पुण्यहीन
Jain Bharati, 2001
धर्मानुभूति और शास्त्रानुकूलता
नन्दकिशोर आचार्य · Jain Bharati, 2001
साधन-साध्य : एक मीमांसा
आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2001
वापसी
उषा प्रियंवदा · Jain Bharati, 2001
अहिसा मे है पच-महातव्रत
दयालचन्द्र सोनी · Jain Bharati, 2001
अतीत व्यतीत
समणी सत्यप्रज्ञा · Jain Bharati, 2000
सुख-दुख से इक परे परम पद
इन्दु टीकेकर · Jain Bharati, 2001
प्रसंग - वयं रक्षामः
Jain Bharati, 2000
आध्यात्मिक आजादी के लिए
Jain Bharati, 2001
शाशवत सुख का मार्ग
साध्वी स्वस्तिकाश्री, खलील जिब्रान · Jain Bharati, 2000
सच और साफगोई
Jain Bharati, 2000
समभावै- प्रतिक्रियारहित जीवन
कु. कोशल · Jain Vidya, 1993
प्रकाशकीय
Jain Vidya, 1988
स्वयं सत्य खोजें
Jain Bharati, 2001
कर्म-विधान
Jain Bharati, 2001
नशा : काबू पाया जा सकता है
साध्वी शुभ्रयशा · Jain Bharati, 2000
इतिहास के पननों मे
Jain Bharati, 2000
गुरुजी
Jain Bharati, 2001
भारतीय संस्कृति की मूल्य प्रक्रिया का परात्पर स्तर
Jain Bharati, 2000
समराङ्गचूडामणि में वस्त्र एवं आभूषणों के उल्लेख
Jhinkoo Yadav · Sambodhi, 1974
ध्रारम्भिक
प्रो. प्रवीणचन्द्र जैन, मुनि नयनन्दी, डॉ. कमलचन्द्र सौगानी · Jain Vidya, 1987
सत्य-यश : विचारणीय पहलू
Jain Bharati, 2001
मोहन महनीय व्यक्तित्व
Jain Bharati, 2000
प्रतिहिंसा से शांति
Jain Bharati, 2001
समया धम्म मुदाहरे मुणी
Jain Bharati, 2001
राणकपुर का प्राचीनतम उल्लेख
Ram Vallabh Somani · Sambodhi, 1980
आ. जिनप्रभसूरि विरचित अंतरंग रास
R. M. Shah · Sambodhi, 1980
आचार्य कुन्दकुन्द और यथार्थ - प्रसद् भृत व्यवहारनय
Jain Vidya, 1990
अह विलय : सहज जीवन का सूत्र
समणी सत्यप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001