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Dynasty, sect or group

जैन

77 articles in the archive discuss जैन, from Jain Vidya, Jnana Desana, Sambodhi and other journals (1974–2011). Open any article for its summary, citation and original PDF.

77 articles

Articles discussing जैन

  1. सम्पादकीय

    Jain Vidya, 1999

    “अकलंकदेव दर्शनशास्त्र के गूढ़ अध्येता થે | उन्होने षट्दर्शन का गंभीर अध्ययन -चिन्तन कर तर्क और युक्ति से जैन-दर्शन की श्रेष्ठता, समीचीनता और आत्मकल्याण हेतु उसकी उपादेयता सशक्तरूप से सिद्ध की”
  2. जैन ग्रंथों एवं विज्ञान में पुद् गल

    Prabhat Kumar Jain, Rani Jain · Jnana Desana, 2010

    ““पुद्गलः शब्द जैन दर्षन का पारिभाषिक शब्द है। जो वर्ण, स्पर्ष, T और रस - इन गुणों से युक्त है, वह पुद्गल”
  3. षट्खण्डागम और धवला में मार्गणास्थान की अवधारणा

    डॉ. राजवीरसिंह शेखावत · Jain Vidya, 1993

    “जैन दर्शन में मान्य जीव વા आत्मा अनेक हैं ,जो तत्त्वतः समान हैं , किन्तु कर्म -पुद्गल के संयोग से उनके गुणों अथवा शक्तियों के विकास में न्युनाधिक्य पाया जाता है”
  4. पण्डितप्रवर आशाधर के सागारधर्मामृत की प्रमुख विशेषताएं

    डॉ. रमेशचन्द जैन · Jain Vidya, 2001

  5. आचार्य कुन्दकुन्द: निश्चय और व्यवहार

    Jain Vidya, 1990

    “जैनदर्शन में उस श्राध्यात्मिक भ्रनुभव को व्यक्त करने के लिए जिस शैली का उपयोग किया गया है उसे हम A% शैली कहते हैं”
  6. मिथ्यात्व खण्डन - धर्मपरीक्षा की आधारभूमि

    Jain Vidya, 1993

    “ग्धमेपरीक्षाः एकं व्यंग्य-प्रधान काव्य है जिसमैं श्राघायों ते एकान्तवादो कथाओं श्रौर विचारों का खण्डन जैन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में बड़े ही सुन्दर ढंग से किया है”
  7. दार्शनिक व्याख्याता कुन्दकुन्दाचार्य के विचार और विवेचना

    डॉ. झादित्य प्रचण्डिया · Jain Vidya, 1990

  8. Hemacandra’s Pramana-Mimamsa - Some Striking Features

    Sagarmal Jain · Sambodhi, 1989

  9. आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में समय

    डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1990

    “तीर्थकर महावीर જી दुंदूमि के स्वर તો गुंजित होते ही रहे ત્રો? उससे मोहाच्छन संसारी जीवों को नया प्रकाश AT जीवन-दान भिला पर कालानुसार उसे व्यवस्थित प्रौर व्याख्यायित करने का श्रेय कुन्दकुन्द को ही जाता है इसलिए उनके नाम से एक विशिष्ट श्राम्नाय भी प्रारम्भ हुई है जिसका सम्बन्ध जैनधमं की मूल-परम्परा श्रौर विशुद्ध भ्रध्यात्म से रहा है”
  10. नैयायिक ज्ञान का साधन प्रत्यक्ष प्रमाण

    Hemlata Srivastava · Sambodhi, 2006

  11. आचार्य अमितगति और हरिषेण की धर्मपरीक्षा एक तुलनात्मक अध्ययन

    डॉ. मागचन्द जन 'मास्कर' · Jain Vidya, 1993

  12. युगदृष्टा उपाध्याय मुनि ज्ञानसागरजी

    उपाध्याय मुनि ज्ञानसागरजी · Jnana Desana, 2011

    “मध्यप्रदेश स्थित मुरैना में पचास वर्ष पूर्व 1 मई सन् 1957 જો श्री शांतिलालजी जैन की धर्मपत्नि श्रीमती अशर्फीदिवी की कोख से होनहार बालक उमेश ने जन्म लिया, जो कि सोनागिरि મેં 05.11.1976 को क्षुल्लक गुणसागर बने”
  13. ख्यातिवाद : प्रमेयकमलमार्तण्ड के प्रकाश में

    डॉ. वीरसागर जैन · Jain Vidya, 2010

    ““ख्यातिवाद' प्रायः सभी भारतीय दर्शनों का एक प्रमुख विषय है, परन्तु जैन ग्रन्थों में इसका विस्तृत विवचेन मात्र प्रभाचन्द्राचार्य के 'प्रमेयकमलमार्त्ततड' एवं न्यायकुमुदचन्द्र में ही देखने को मिलता”
  14. अनेकांत: सामाजिक अभिप्राय

    शुभू पटवा · Jain Bharati, 2001

    “जैन धर्म का धरातल भारत-भूमि है, बेशक भारत से बाहर भी यह फैला है, फलवान होता जा रहा”
  15. समय की कसौटी पर सिद्ध वास्तु शास्त्र

    Acharya Ashok Sahajanand · Jnana Desana, 2010

  16. कर्मशास्त्र और मनोविज्ञान

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000

  17. आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में मुक्ति तत्त्व

    डॉ. प्रेमसागर जैन · Jain Vidya, 1990

  18. आयुर्वेद की एक पाण्डुलिपि - वैद्यमनोत्सव

    Anupam Jain, Br. Rajni Jain · Jnana Desana, 2010

  19. अहिंसा-ब्रह्मचर्य : दैहिक विमर्श

    आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2001

  20. अहिंसा की सामाजिक ताकत

    नंद चतुर्वेदी · Jain Bharati, 2000

  21. शाकाहार का मर्म

    Jain Bharati, 2000

    “मांसाहार के साथ जीवहिंसा की क्रूरता जुड़ी हुई है और जीवहिंसा करने वाला व्यक्ति कभी भी संवेदनशील इंसान नहीं हो सकता। जैन तो हो ही नहीं सकता।”
  22. धम्मो दीवों पड़ट्ठाण

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  23. ध्यान - योग : जैन सन्दर्भ

    Acharya Ashok Sahajanand · Jnana Desana, 2011

    “जैन ग्रंथों में भी 'योग' की महत्ता को स्वीकार किया गया है।”
  24. जाणई - पासइ

    Harnarayan U. Pandya · Sambodhi, 1990

    “इन समस्त तथ्यों के आयार पर यह स्वीकार करना होगा कि भारत में जैन आगमिक तह में 'जानाति' और 'पश्यति' शब्द एक ओर सामान्य अर्थ में प्रयुक्त द्वोते वे तथा 'धरी ओर बे एक दूसरे से मिन्‍न अथ' के वाचक भी ये।”
  25. आरम्भिक

    Jain Vidya, 1985

    “भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य की विभिन्न विधाश्रों की श्रीवृद्धि में जैनाचायों, गृहस्थ विद्वानों, त्यागियों, ब्रतियों ग्रादि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।”
  26. जंबूसामिचरिउ में छन्द-योजना

    Jain Vidya, 1987

  27. कविमनीषी योगीन्दु का काव्यशास्त्रीय मूल्यांकन

    Jain Vidya, 1988

    “जैन कवियों का दृष्टिकोण पुरुष के पुरुषाथं चतुष्ट्य की चरम सीमा જો स्पशं करता है । किसी भी काव्यरूप में रचा गया काव्य का सार-सारांश मोक्ष की श्रोर उन्मुख होता है”
  28. संतुलन का सेतु है अनेकांत

    Jain Bharati, 2001

  29. जसहरचरिउ में श्रात्मा सम्बन्धी विचार

    धीर्यांशकुमार सिघई · Jain Vidya, 1985

  30. व्यक्तित्व विकास की चाबी

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000

  31. कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों में सम्यग्चारित्र की अवधारणा

    डॉ. राजकुमारी जैन · Jain Vidya, 1990

  32. कषाय विवेचना

    Jain Bharati, 2001

  33. अप्प दीपो भव

    वीरेन्द्रकुमार जैन · Jain Bharati, 2001

  34. समाधि : चैतन्य का अनुभव

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  35. हिंसा की जड़े

    सच्चिदानन्द सिन्हा · Jain Bharati, 2001

  36. बंधनमुक्ति-पर्व

    Jain Bharati, 2000

  37. आत्म-नियंत्रण से कषाय-मुक्ति

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  38. एक्का मणुस्सजाई

    Jain Bharati, 2001

  39. प्रास्ताविक

    Jain Vidya, 1988

  40. अहिंसक समाज के सूत्र

    Jain Bharati, 2001

  41. गांधी और जनतंत्र

    जैनेन्द्र कुमार · Jain Bharati, 2001

  42. प्रकाशकीय

    कपूरचन्द पाटनी · Jain Vidya, 1985

  43. पुण्य मीमांसा

    मुनि रमेशकुमार · Jain Bharati, 2001

  44. महाकवि पुष्पदंत और उनकी रसाभिव्यक्ति

    डॉं० प्रेमचंद रांवका · Jain Vidya, 1985

    “जैन श्रपश्च श-परम्परा में धार्मिक भावना विरहित काव्य की कल्पना नहीं की जा सकती”
  45. अमितगति श्रावकाचार में पदस्थ ध्यान और शरीर के शक्तिकेन्द्र

    डॉ. सोहनलाल देवोत · Jain Vidya, 1993

  46. मैत्री : दृष्टि का रूपांतरण

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000

  47. इनाम

    जैनेन्द्र कुमार · Jain Bharati, 2000

  48. स्वाध्याय : ज्ञान की कुंजी

    डॉ. प्रेम सुमन जैन · Jain Bharati, 2000

  49. पुरुषार्थं और पुण्यहीन

    Jain Bharati, 2001

  50. धर्मानुभूति और शास्त्रानुकूलता

    नन्दकिशोर आचार्य · Jain Bharati, 2001

  51. साधन-साध्य : एक मीमांसा

    आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2001

  52. वापसी

    उषा प्रियंवदा · Jain Bharati, 2001

  53. अहिसा मे है पच-महातव्रत

    दयालचन्द्र सोनी · Jain Bharati, 2001

  54. अतीत व्यतीत

    समणी सत्यप्रज्ञा · Jain Bharati, 2000

  55. सुख-दुख से इक परे परम पद

    इन्दु टीकेकर · Jain Bharati, 2001

  56. प्रसंग - वयं रक्षामः

    Jain Bharati, 2000

  57. आध्यात्मिक आजादी के लिए

    Jain Bharati, 2001

  58. शाशवत सुख का मार्ग

    साध्वी स्वस्तिकाश्री, खलील जिब्रान · Jain Bharati, 2000

  59. सच और साफगोई

    Jain Bharati, 2000

  60. समभावै- प्रतिक्रियारहित जीवन

    कु. कोशल · Jain Vidya, 1993

  61. प्रकाशकीय

    Jain Vidya, 1988

  62. स्वयं सत्य खोजें

    Jain Bharati, 2001

  63. कर्म-विधान

    Jain Bharati, 2001

  64. नशा : काबू पाया जा सकता है

    साध्वी शुभ्रयशा · Jain Bharati, 2000

  65. इतिहास के पननों मे

    Jain Bharati, 2000

  66. गुरुजी

    Jain Bharati, 2001

  67. भारतीय संस्कृति की मूल्य प्रक्रिया का परात्पर स्तर

    Jain Bharati, 2000

  68. समराङ्गचूडामणि में वस्त्र एवं आभूषणों के उल्लेख

    Jhinkoo Yadav · Sambodhi, 1974

  69. ध्रारम्भिक

    प्रो. प्रवीणचन्द्र जैन, मुनि नयनन्दी, डॉ. कमलचन्द्र सौगानी · Jain Vidya, 1987

  70. सत्य-यश : विचारणीय पहलू

    Jain Bharati, 2001

  71. मोहन महनीय व्यक्तित्व

    Jain Bharati, 2000

  72. प्रतिहिंसा से शांति

    Jain Bharati, 2001

  73. समया धम्म मुदाहरे मुणी

    Jain Bharati, 2001

  74. राणकपुर का प्राचीनतम उल्लेख

    Ram Vallabh Somani · Sambodhi, 1980

  75. आ. जिनप्रभसूरि विरचित अंतरंग रास

    R. M. Shah · Sambodhi, 1980

  76. आचार्य कुन्दकुन्द और यथार्थ - प्रसद्‌ भृत व्यवहारनय

    Jain Vidya, 1990

  77. अह विलय : सहज जीवन का सूत्र

    समणी सत्यप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001