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महावीर

41 articles in the archive discuss महावीर, from Jain Bharati, Jain Vidya, Jnana Desana and other journals (1985–2012). Open any article for its summary, citation and original PDF.

41 articles

Articles discussing महावीर

  1. विशवधर्म का ताबीज : सच्चंमि धिइं कुव्वहा

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000

    “महावीर ने जो सिद्धांत दिए, वे किसी જો लक्ष्य में रखकर नहीं दिए कि अमुक वर्ण को देना है। सौभाग्य या दुर्भाग्य कुछ भी कहें, जो इतना व्यापक धर्म था, વદ एक जाति के रूप में बदल गया यानी जैन एक जाति बन गई।”
  2. जैन आगमो में गणित

    डॉ. अनुपम जैन · Jain Bharati, 2000

    “महावीर के अनुसार तो चराचर जगत में जो कुछ भी है वह गणित के बिना नहीं”
  3. अहिंसा की सामाजिक ताकत

    नंद चतुर्वेदी · Jain Bharati, 2000

    “महावीर का सबसे महत्त्वपूर्ण सपना समता के आधार पर दुनिया की रचना करना था।”
  4. स्वातंत्र्य चेतना : जैन चितन

    साध्वी श्रुतयशा · Jain Bharati, 2000

  5. महाप्रज्ञ : जैन नहीं जिन

    डॉ. दयानंद भार्गव · Jain Bharati, 2000

  6. रायकुमारचरिउ एक आद्यन्त जैन-काव्य

    डॉ. गजानन नरसिंह साठे · Jain Vidya, 1985

  7. धर्मचक्र की धुरी-गणधर गौतम स्वामी

    Sumatchand Diwakar · Jnana Desana, 2008

    “आदिनाथ से महावीर પર્યત सभी तीर्थकरों की देशना गणधर देवों જે निमित्त से ही हुई છે,”
  8. जंबसामिचरिउ के मंगल-प्रसंग एक व्याकरणिक विश्लेषण

    डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1987

  9. निरतिचार साधना : आराधना

    साध्वी राजीमती · Jain Bharati, 2001

  10. जैनधर्म और प्रजातान्त्रिक जीवन

    Dharmachand Jain · Jnana Desana, 2011

  11. अहिंसा : व्यावहारिक अनिवार्यता

    डॉ. महेन्द्रसागर प्रचंडिया · Jain Bharati, 2000

    “महावीर सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चरित्र की बात कहते हैं। वह इस दृष्टि से, आज के दौर में बहुत मौजूं सिद्ध होती है।”
  12. आत्मविजय का नीतिशास्त्र

    डॉ. बलवंत जानी · Jain Bharati, 2001

  13. प्रास्ताविक

    Jain Vidya, 1987

    “जंबूस्वामी भगवान् महावीर के गणधर સુધર્થાચાર્ય द्वारा जेनसंघ में दीक्षित किये गए थे | वे इस काल के श्रस्तिम केवली थे एवं उन्होंने भगवान् महावीर के निर्वाण के 64 वर्ष पश्चात् भ्र्थात् 463 ई. पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था”
  14. Pracheen Jainagamon mein Charvakadarshan ka Prastutikaran evam Samiksha

    Sagarmal Jain · Sambodhi, 2004

  15. आधुनिक भू-विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में जम्बूदीप और मेरुपर्वत

    Rajkumar Nandgaonkar · Jnana Desana, 2011

  16. Karm ka Bhotik Swarup

    Mahaveer Raj Gelda · Sambodhi, 2003

    “जैन दर्शन ने जीव और जगत के वैविध्य का कारण कर्म को स्वीकार लिया । भगवती सूत्र में भगवाम महावीर कहते हैं जीव कर्म के द्वार विभक्ति भाव अर्थात्‌ विभिन्नता को प्राप्त होता हैं ।'”
  17. सफलता का सूत्र--शम और श्रम

    साध्वी विमलप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001

  18. बड़ा होता कद

    Jain Bharati, 2000

  19. जैनविद्या का स्वयंभू विशेषांक : विद्वानों की दृष्टि में

    Jain Vidya, 1985

  20. स्वाध्याय : ज्ञान की कुंजी

    डॉ. प्रेम सुमन जैन · Jain Bharati, 2000

  21. आचार्य समंतभद्र की अनुपम कृति रत्नकरंड श्रावकाचार

    श्रीमती प्रभावती जैन · Jain Vidya, 1996

    “भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् अनेक उत्कृष्ट मनीषी भारतभूमि पर हुए हैं, परन्तु उनमें आगामी तीर्थकर होने का सौभाग्य शलाका पुरुषों में राजा श्रेणिक के साथ स्वामी समंतभद्र को ही प्राप्त हो सका है।”
  22. अनेकांत का फलित नयवाद

    कुमार अनेकान्त जैन · Jain Bharati, 2001

  23. परिकल्पना नए मानव की

    आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2000

  24. परमसुख की साधनाः विपश्यना: कन्हैयालालजी लोढ़ा

    Sagarmal Jain · Sambodhi, 2012

  25. नय, अनेकांत ओर स्याद्वाद

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  26. इस अंक के सहयोगी रचनाकार

    डॉ० उदयचंद जैन · Jain Vidya, 1990

  27. प्रकाशकीय

    Jain Vidya, 1985

  28. श्रद्धा : जड़ों का अभिसिचन

    साध्वी मुदितयशा · Jain Bharati, 2000

  29. एक उद्दाम अनुसंधित्सु

    डॉ. बच्छराज · Jain Bharati, 2001

  30. मैं कौन हूं

    Jain Bharati, 2000

  31. पशु क्रूरता कानून कितना न्याय संगत?

    Chanchalmal Chordiya · Jnana Desana, 2010

  32. प्रकाशकीय

    कपूरचन्द पाटनी · Jain Vidya, 1985

  33. यशस्तिलक के सन्दर्भ में अहिंसा

    Prof. Gokul Chandra Jain · Jnana Desana, 2011

  34. भविसयत्तकहा का धार्मिक परिवेश

    श्री भीयांशकुमार सिघई · Jain Vidya, 1986

  35. परमात्मप्रकाश एक विश्लेषण

    डॉ. गदाधर सिंह · Jain Vidya, 1988

  36. आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में मुक्ति तत्त्व

    डॉ. प्रेमसागर जैन · Jain Vidya, 1990

  37. आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में समय

    डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1990

    “तीर्थकर महावीर જી दुंदूमि के स्वर તો गुंजित होते ही रहे ત્રો? उससे मोहाच्छन संसारी जीवों को नया प्रकाश AT जीवन-दान भिला पर कालानुसार उसे व्यवस्थित प्रौर व्याख्यायित करने का श्रेय कुन्दकुन्द को ही जाता है इसलिए उनके नाम से एक विशिष्ट श्राम्नाय भी प्रारम्भ हुई है जिसका सम्बन्ध जैनधमं की मूल-परम्परा श्रौर विशुद्ध भ्रध्यात्म से रहा है”
  38. सम्पादकीय

    Jain Vidya, 2001

  39. धम्मो दीवों पड़ट्ठाण

    आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001

  40. मोहन महनीय व्यक्तित्व

    Jain Bharati, 2000

  41. निर्धूम दीप की अप्रकप लौ

    Jain Bharati, 2001