Articles discussing महावीर
विशवधर्म का ताबीज : सच्चंमि धिइं कुव्वहा
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2000
“महावीर ने जो सिद्धांत दिए, वे किसी જો लक्ष्य में रखकर नहीं दिए कि अमुक वर्ण को देना है। सौभाग्य या दुर्भाग्य कुछ भी कहें, जो इतना व्यापक धर्म था, વદ एक जाति के रूप में बदल गया यानी जैन एक जाति बन गई।”
जैन आगमो में गणित
डॉ. अनुपम जैन · Jain Bharati, 2000
“महावीर के अनुसार तो चराचर जगत में जो कुछ भी है वह गणित के बिना नहीं”
अहिंसा की सामाजिक ताकत
नंद चतुर्वेदी · Jain Bharati, 2000
“महावीर का सबसे महत्त्वपूर्ण सपना समता के आधार पर दुनिया की रचना करना था।”
स्वातंत्र्य चेतना : जैन चितन
साध्वी श्रुतयशा · Jain Bharati, 2000
महाप्रज्ञ : जैन नहीं जिन
डॉ. दयानंद भार्गव · Jain Bharati, 2000
रायकुमारचरिउ एक आद्यन्त जैन-काव्य
डॉ. गजानन नरसिंह साठे · Jain Vidya, 1985
धर्मचक्र की धुरी-गणधर गौतम स्वामी
Sumatchand Diwakar · Jnana Desana, 2008
“आदिनाथ से महावीर પર્યત सभी तीर्थकरों की देशना गणधर देवों જે निमित्त से ही हुई છે,”
जंबसामिचरिउ के मंगल-प्रसंग एक व्याकरणिक विश्लेषण
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1987
निरतिचार साधना : आराधना
साध्वी राजीमती · Jain Bharati, 2001
जैनधर्म और प्रजातान्त्रिक जीवन
Dharmachand Jain · Jnana Desana, 2011
अहिंसा : व्यावहारिक अनिवार्यता
डॉ. महेन्द्रसागर प्रचंडिया · Jain Bharati, 2000
“महावीर सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चरित्र की बात कहते हैं। वह इस दृष्टि से, आज के दौर में बहुत मौजूं सिद्ध होती है।”
आत्मविजय का नीतिशास्त्र
डॉ. बलवंत जानी · Jain Bharati, 2001
प्रास्ताविक
Jain Vidya, 1987
“जंबूस्वामी भगवान् महावीर के गणधर સુધર્થાચાર્ય द्वारा जेनसंघ में दीक्षित किये गए थे | वे इस काल के श्रस्तिम केवली थे एवं उन्होंने भगवान् महावीर के निर्वाण के 64 वर्ष पश्चात् भ्र्थात् 463 ई. पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था”
Pracheen Jainagamon mein Charvakadarshan ka Prastutikaran evam Samiksha
Sagarmal Jain · Sambodhi, 2004
आधुनिक भू-विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में जम्बूदीप और मेरुपर्वत
Rajkumar Nandgaonkar · Jnana Desana, 2011
Karm ka Bhotik Swarup
Mahaveer Raj Gelda · Sambodhi, 2003
“जैन दर्शन ने जीव और जगत के वैविध्य का कारण कर्म को स्वीकार लिया । भगवती सूत्र में भगवाम महावीर कहते हैं जीव कर्म के द्वार विभक्ति भाव अर्थात् विभिन्नता को प्राप्त होता हैं ।'”
सफलता का सूत्र--शम और श्रम
साध्वी विमलप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001
बड़ा होता कद
Jain Bharati, 2000
जैनविद्या का स्वयंभू विशेषांक : विद्वानों की दृष्टि में
Jain Vidya, 1985
स्वाध्याय : ज्ञान की कुंजी
डॉ. प्रेम सुमन जैन · Jain Bharati, 2000
आचार्य समंतभद्र की अनुपम कृति रत्नकरंड श्रावकाचार
श्रीमती प्रभावती जैन · Jain Vidya, 1996
“भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् अनेक उत्कृष्ट मनीषी भारतभूमि पर हुए हैं, परन्तु उनमें आगामी तीर्थकर होने का सौभाग्य शलाका पुरुषों में राजा श्रेणिक के साथ स्वामी समंतभद्र को ही प्राप्त हो सका है।”
अनेकांत का फलित नयवाद
कुमार अनेकान्त जैन · Jain Bharati, 2001
परिकल्पना नए मानव की
आचार्यश्री तुलसी · Jain Bharati, 2000
परमसुख की साधनाः विपश्यना: कन्हैयालालजी लोढ़ा
Sagarmal Jain · Sambodhi, 2012
नय, अनेकांत ओर स्याद्वाद
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
इस अंक के सहयोगी रचनाकार
डॉ० उदयचंद जैन · Jain Vidya, 1990
प्रकाशकीय
Jain Vidya, 1985
श्रद्धा : जड़ों का अभिसिचन
साध्वी मुदितयशा · Jain Bharati, 2000
एक उद्दाम अनुसंधित्सु
डॉ. बच्छराज · Jain Bharati, 2001
मैं कौन हूं
Jain Bharati, 2000
पशु क्रूरता कानून कितना न्याय संगत?
Chanchalmal Chordiya · Jnana Desana, 2010
प्रकाशकीय
कपूरचन्द पाटनी · Jain Vidya, 1985
यशस्तिलक के सन्दर्भ में अहिंसा
Prof. Gokul Chandra Jain · Jnana Desana, 2011
भविसयत्तकहा का धार्मिक परिवेश
श्री भीयांशकुमार सिघई · Jain Vidya, 1986
परमात्मप्रकाश एक विश्लेषण
डॉ. गदाधर सिंह · Jain Vidya, 1988
आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में मुक्ति तत्त्व
डॉ. प्रेमसागर जैन · Jain Vidya, 1990
आचार्य कुन्दकुन्द की दृष्टि में समय
डॉ. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1990
“तीर्थकर महावीर જી दुंदूमि के स्वर તો गुंजित होते ही रहे ત્રો? उससे मोहाच्छन संसारी जीवों को नया प्रकाश AT जीवन-दान भिला पर कालानुसार उसे व्यवस्थित प्रौर व्याख्यायित करने का श्रेय कुन्दकुन्द को ही जाता है इसलिए उनके नाम से एक विशिष्ट श्राम्नाय भी प्रारम्भ हुई है जिसका सम्बन्ध जैनधमं की मूल-परम्परा श्रौर विशुद्ध भ्रध्यात्म से रहा है”
सम्पादकीय
Jain Vidya, 2001
धम्मो दीवों पड़ट्ठाण
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
मोहन महनीय व्यक्तित्व
Jain Bharati, 2000
निर्धूम दीप की अप्रकप लौ
Jain Bharati, 2001