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प्रकाशकीय

By कपूरचन्द पाटनी

Vol. 02 · No. 01April 1985pp. 4–5Hindi

सारांश

यह संपादकीय प्रसिद्ध अपभ्रंश कवि तथा पुराणकार महाकवि पुष्पदंत को समर्पित जैनविद्या के दूसरे अंक का परिचय देता है। संपादकों का कहना है कि महाकवि स्वयंभू को समर्पित पहले अंक को विद्वानों, भाषाविज्ञानियों तथा पाठकों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली थी, जिससे इस श्रृंखला को जारी रखने की प्रेरणा मिली। लेख में इस बात पर बल दिया गया है कि जैन साहित्य की रचना केवल सौंदर्य के लिए नहीं की गई थी, बल्कि मुख्य रूप से आध्यात्मिक उत्थान तथा लोक कल्याण के लिए की गई थी। जैन लेखकों ने यद्यपि साहित्यिक युक्तियों तथा काव्य रूपों का प्रयोग किया, तथापि उनका मुख्य उद्देश्य आत्मज्ञान तथा समाज का कल्याण था। जैन आचार्यों ने धार्मिक शिक्षाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए हमेशा समकालीन स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया। स्वयं भगवान महावीर ने इस कार्य के लिए अर्धमागधी का प्रयोग किया था। बाद में जैन लेखकों ने भी इसी परम्परा को जारी रखते हुए विभिन्न भारतीय भाषाओं में पर्याप्त साहित्य का निर्माण किया। प्राकृत के बाद अपभ्रंश एक महत्वपूर्ण लोकभाषा के रूप में उभरी। तथापि इसका साहित्य उपेक्षित ही रहा क्योंकि इसकी अनेक पांडुलिपियाँ जैन भंडारगृहों में सुरक्षित रखी गई थीं और उन्हें प्रायः केवल धार्मिक ग्रन्थों के रूप में ही देखा जाता था। संपादकीय में जर्मन विद्वान रिचर्ड पिस्केल को श्रेय दिया गया है, जिन्होंने 1902 में अपने शोध द्वारा अपभ्रंश की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया था। जैकोबी तथा आल्स्डॉर्फ जैसे विद्वानों के बाद के योगदानों ने भारतीय साहित्य के इतिहास में इस भाषा के महत्व को और अधिक स्थापित किया। लेखिका का कहना है कि इन प्रयासों के बिना अपभ्रंश के अध्ययन की ओर ध्यान नहीं जाता। संपादकीय में यह भी कहा गया है कि अपभ्रंश की अधिकांश ज्ञात कृतियाँ जैन विद्वानों द्वारा रचित हैं और इसलिए साहित्यिक मूल्य के साथ-साथ सामाजिक तथा नैतिक चिंताओं को भी सम्मिलित करती हैं। इस महत्व को समझते हुए जैनविद्या ने अपभ्रंश में लिखने वाली जैन लेखिकाओं को समर्पित विशेषांकों की एक श्रृंखला शुरू की। अंतिम भाग में पाठकों की प्रतिक्रिया का स्वागत किया गया है, भाग लेने वाले विद्वानों और लेखकों के योगदान को स्वीकार किया गया है, और डॉ. गोपीचंद पटनी, प्रो. प्रवीर चंद्र जैन, मानवरलाल पल्याका, सुश्री प्रीति जैन और संपादन एवं प्रकाशन प्रक्रिया से जुड़े अन्य लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया गया है। ग्रंथ के गुणवत्तापूर्ण निर्माण के लिए मुद्रक सोहनलाल जैन की भी सराहना की गई है।

Summary reviewed by a volunteer editor.

Hindi summary machine-translated from the English.

निष्कर्ष

यह संपादकीय "ज्ञानविद्या" के दूसरे अंक को अपभ्रंश भाषा की साहित्यिक और भाषाई विरासत को पुनर्जीवित करने और मान्यता देने के एक समर्पित प्रयास के रूप में स्थापित करता है, विशेष रूप से जैन विद्वानों द्वारा संरक्षित। महाकवि पुष्पदंत की विरासत से प्रकाशन को जोड़कर, संपादिकाएँ पुष्टि करती हैं कि जैन साहित्य केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि भारतीय साहित्यिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चर्चा इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे विदेशी विद्वानों ने पहली बार अपभ्रंश की ओर ध्यान आकर्षित किया, यह दर्शाता है कि उनके हस्तक्षेप के बिना, यह समृद्ध संग्रह उपेक्षित रह सकता था। संपादकीय में पाठक प्रतिक्रिया के लिए आह्वान और योगदानकर्ताओं की स्वीकृति एक सहयोगात्मक, विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण का संकेत देती है। अंततः, यह अंक अपभ्रंश और जैन योगदानों को मुख्यधारा के शैक्षणिक प्रवचन में ऊपर उठाने के पत्रिका के मिशन को मजबूत करता है, यह सुनिश्चित करता है कि इन कार्यों का अध्ययन अस्पष्ट ग्रंथों के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य और भाषा विज्ञान के व्यापक आख्यान के अभिन्न अंग के रूप में किया जाए।

Key passages

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  • “इससे पूवं पत्रिका का प्रथम પ્રક श्रपश्नश के ही ज्ञात महाकवियों में भ्रादतम महाकवि स्वयंभू के नाम पर प्रकाशित हुभ्रा था”
  • “तीर्थकरों का कल्याणकारी उपदेश जन-जन तक पहुँच सके इसके लिए उन्होंने उस समय की प्रचलित लोक-भाषा का चयन किया”
  • “सन् 1902 में सर्वप्रथम प्रसिद्ध जमंन विद्वान् पिशल ने ““मारेरी श्नलिएव सुर केण्टिनस डेस अपभ्रेश” शीषेक एक निबंध लिख कर विद्वानों का ध्यान इस श्रोर श्राकषित किया”

Works cited in this article

  1. ““मारेरी श्नलिएव सुर केण्टिनस डेस अपभ्रेश”

Discussed in this article

People

  • पष्पदंत
  • पिशल
  • जकोवी
  • आाल्सफोड
  • गोपीचन्द पाटनी
  • प्रवीराचन्द्र जेन
  • महावीर 41
  • सोहनलाल जैन
  • स्वयंभू 16

Dynasties, sects & groups

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Vol. 02 · No. 01
1–3प्रास्ताविक4–5प्रकाशकीयकपूरचन्द पाटनीCurrent article6–8आरम्भिक9–15महाकवि पुष्पदन्त : व्यक्तित्व और कर्तृत्वडां०° आदित्य प्रचण्डिया16चन्द्रप्रभ स्तुतिचन्द्रप्रभ, महाकवि पुष्पदन्त17–24अपभ्रंश के संवेदनशील महाकवि पुष्पदंतडां० देवेन्रकुमार શાસ્ત્રी25–32महाकवि पुष्पदंत और उनका काव्यडं° योगेन्नाथ शर्मा33–42पुष्पदंत की भाषाडॉ. कैलाशचन्द्र भाटिया43–49महापुराण की काव्यभाषाडॉ. श्रीरंजन सूरिदेव50शब्द प्रणामपण्डित विष्णुकान्त शुक्ल51–63महापुराण के रामायण खण्ड की बिम्ब-योजना64–64लोभी जीव65–72महाकवि पुष्पदंत द्वारा रचित महापुराण की बिम्ब-योजनाडॉ० गदाघरसिह73–78पुष्पदंत और सुरदास (वात्सल्य)डॉ. प्रेमसागर जैन79–89जैन रामकथाओं के परिप्रेक्ष्य पुष्पदन्त की रामकथासुशो प्रीति जैन90–90जीवन की क्षणभंगुरता91–96महाकवि पुष्पदंत का दार्शनिक ऊहापोहडा० भागचद जन “भास्कर97–100महाकवि पुष्पदंत के आदिपुराण की एक सचित्र पाण्डुलिपिराँ कस्तू रचन्द कासलीवाल101–106महाकवि पुष्पदंत की रचनाओं की राजस्थान में लोकप्रियतापं ध्न्पकम्द न्यायतीयथ107–108आणदाडॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री109–111भूमिकाडॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री112–121आणंदा129–134जैनविद्या संस्थान, श्रीमहावीरजी135–140जैनविद्या का स्वयंभू विशेषांक : विद्वानों की दृष्टि में141–142साहित्य-समीक्षा

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