Articles discussing भविसयत्त
भविसयत्तकहा का साहित्यिक महत्त्व
Jain Vidya, 1986
अपभ्रंश का शिखर महाकाव्य भविसयत्तकहा
डॉ० शरीरंजन सूरिदेव, धनपाल · Jain Vidya, 1986
“'भविसयत्तकहदा' की भाषा प्राचीन अपभ्रंश है । यही कारण है कि इसके शाब्दिक प्रयोगों में बहुरूपता શ્રૌર व्याकरण की शिथिलता परिलक्षित होती है”
भेंट कवि धनपाल से
नेमीचंद पटोरिया · Jain Vidya, 1986