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आचार्य तुलसी : ज्योतिर्मय साधक

By आचार्यश्री महाप्रज्ञ

Vol. 61 · No. 01January - 2013pp. 18Hindi

Summary

आचार्य तुलसी का जीवन मुनित्व, गुरुत्व और धर्म के नेतृत्व की एक उल्लेखनीय निष्पत्ति है। मुनि बनना जीवन की बड़ी घटना है, जिसमें व्यक्ति शरीर, इच्छा, संकल्प और अहं का विसर्जन करता है। तुलसी ने एक दिन मुनि बनकर महामना कालूको अपना गुरु चुना और अहं से इतने खाली हुए कि गुरु ने उन्हें भर दिया। बाईस वर्ष की छोटी अवस्था में ही वे गुरु बन गए। तेरापंथ परंपरा में गुरु ही किसी को गुरु बनाता है, किंतु गुरुत्व प्रदत्त नहीं हो सकता। आचार्य तुलसी ने अपने गुरुत्व को इतना विकसित किया कि यह अनुभव नहीं हुआ कि वह गुरु प्रदत्त है। उन्होंने विद्या का वितरण शिष्यों, गुरु-भाइयों और समूचे वातावरण में किया, जिससे तेरापंथ का मनीषी वर्ग ज्ञान के शिखरों को छूने लगा। नैतिकता और धर्म-ज्ञान तभी कृतार्थ होता है जब उसकी निष्पत्ति आचार में होती है। ग्यारह वर्ष तक ज्ञान की अजस्र

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Conclusion

आचार्य तुलसी के जीवन और साधना का यह विवरण बताता है कि सच्चा गुरुत्व केवल पद से नहीं, बल्कि आचरण और नैतिकता के विकास से प्राप्त होता है। उन्होंने धर्म को क्रियाकाण्ड से मुक्त कर नैतिकता को उसका मूल आधार बनाया। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि धर्म की प्रतिष्ठा अब नैतिकता-शून्य नहीं रही। उनके नेतृत्व ने यह अनुभूति कराई कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति और समाज का कल्याण

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In this issue

Vol. 61 · No. 01
9–10सम्पादकीय11मंगल सन्देश नव वर्ष 2013आचार्य श्री रह्टाश्रमण स्व12–13समय का अंकनआचार्यश्री महाश्रमण14श्रद्धा-प्रणति15तेरा तुझको करते अर्पण16–17आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी समारोह18आचार्य तुलसी : ज्योतिर्मय साधकआचार्यश्री महाप्रज्ञCurrent article19आभावलय की आभाआचार्यश्री महाश्रमण20तृप्ति की सौगात21उजालों के आस-पास22–23लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रस्थान24–25संस्कार, जो मेरी मां ने दिए26–30मेरी आकांक्षा : मानवता की सेवा31–32ऐसे मिला मुझे अहिंसा का प्रशिक्षण33–34उद्देश्यपूर्ण जीवन का पड़ाव35–36सफर आधी शताब्दी का37–39आचार्य पद का विसर्जन40–44विचार दीर्घा में आचार्यश्री तुलसी45–46अपूर्व रात : विलक्षण वात47–48जैन धर्म पहचान के कुछ घटक49–51जैन जीवनशैली52तलाश आदमी की53–54अभिमान है आपदाओं का उत्स55–56समाज-विकास का आधार : विधायक भाव57–58संसद खड़ी है जनता के सामने59चारित्रिक मूल्यों के प्रति अनास्था क्यों ?

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