Articles discussing देवदत्त
जंबूसामिचरिउ-छवि भली संवारी वीर कवि
Jain Vidya, 1987
“वीर कवि ने कवि स्वयंभू, कवि पुष्पदंत श्रौर अपने पिता देवदत्त का ही स्मरण किया है (5.1)-“स्वियंभूदेव के होने पर एक ही कवि થા, पुष्पदंत જે होने पर दो हो गये श्रौर देवदत्त के होने पर तीन । यहां बहुत दिनों से काव्य घर-घर से दूर चला गया થા, श्रब कविवल्लभ वीर के होने पर पुन: लौट प्राया।''”
रायक्मारचरिउ में प्रतिपादित जीवनमूल्य
डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1985
जंबसामिचरिउ के यशस्वी महाकवि वीर का व्यक्तित्व
डॉ. महेन्द्रसागर प्रचंडिया · Jain Vidya, 1987
प्रास्ताविक
Jain Vidya, 1987
प्रारम्भिक
प्रो. प्रवीणचन्द्र जैन · Jain Vidya, 1987
जैन अध्यात्म योग का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ : मोक्षपाहुड
डॉ. अनेकान्तकुमार जैन · Jain Vidya, 2013