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जम्बूसामिचरिउ की कथानकसूष्टि और हिन्दी काव्य-परम्परा
डां. (श्रीमती) पुष्पलता जैन · Jain Vidya, 1987
“जंबूसामिचरिउ महाकवि वीर की कदाचित् एकमात्र ऐसी कृति है जो उनके व्यक्तित्व રદ कृतित्व को काफी શ્રંશ तक उजागर कर देती है”
जंबसामिचरिउ का साहित्यिक मूल्यांकन
प्रास्ताविक
Jain Vidya, 1987
“जंबूस्वामी भगवान् महावीर के गणधर સુધર્થાચાર્ય द्वारा जेनसंघ में दीक्षित किये गए थे | वे इस काल के श्रस्तिम केवली थे एवं उन्होंने भगवान् महावीर के निर्वाण के 64 वर्ष पश्चात् भ्र्थात् 463 ई. पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था”
जंबसामिचरिउ के नारी-पात्र
Jain Vidya, 1987
हरिवंशपुराण
Jain Vidya, 1993
जंबूसामिचरिउ में छन्द-योजना
Jain Vidya, 1987
जंबसामिचरिउ & वैराग्य-प्रसंग
Jain Vidya, 1987
“सभी धार्मिक साहित्य-स्जंकों (मुनियों-प्राचार्थों) ने नारी को श्रात्मशोधन के मार्ग मे सदैव एक बाधा ही माना है किन्तु वीर कवि ने नागवसू का यह एक प्रनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर परम्परा से चले શ્રા रहे इस पूर्वाग्रह को भ्रसत्य एवं थोथा साबित किया है”