Articles discussing आचार्यश्री महाप्रज्ञजी
अहंकार और ममकार के विसर्जन का महोत्सव
Jain Bharati, 2001
संतुलन का सेतु है अनेकांत
Jain Bharati, 2001
बाहर का नहीं, अंदर का सौंदर्य बढ़े
Jain Bharati, 2001
“आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने समाज में नैतिकता और संयम की महती आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इस समाधि स्थल को नैतिकता व संयम का शक्तिपीठ माना | उन्होंने कहा कि शक्ति के बहुत से पीठ गिनाए जा सकते हैं, लेकिन यह समाधिस्थल नैतिकता और संयम का शक्तिपीठ”
एक्का मणुस्सजाई
Jain Bharati, 2001
“आचार्यश्री महाप्रज्ञजी कहते है कि लोकतंत्र के सारथियौ की योग्यता के कुछ मानक निर्धारित होने”
दो कालजयी नक्षत्र
साध्वी मुदितयशा · Jain Bharati, 2001
एक उद्दाम अनुसंधित्सु
डॉ. बच्छराज · Jain Bharati, 2001
महासभा का 87वां वार्षिक अधिवेशन संपन्न
Jain Bharati, 2001
संवत्सरी : अहेतुक उलझन
आचार्यश्री महाप्रज्ञ · Jain Bharati, 2001
अध्यात्म और सामाजिकता : आचार्य भिक्षु की दृष्टि में
डॉ. दयानंद भार्गव · Jain Bharati, 2000
अहिंसा को जानो तो
Jain Bharati, 2001
यह जो देखते हैं
Jain Bharati, 2001
पर्युषण : प्रेम और सहअस्तित्व का प्रशिक्षण
साध्वी कनकश्री · Jain Bharati, 2000
श्रमण कौन
समणी सत्यप्रज्ञा · Jain Bharati, 2001
छिद्दू की मैं -मैं
Jain Bharati, 2001
कितने युवजन
Jain Bharati, 2001
क्रियावाद बनाम कर्मवाद
Jain Bharati, 2001