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सुदंसणचरिउ

12 articles in the archive discuss सुदंसणचरिउ, from Jain Vidya (1987–1987). Open any article for its summary, citation and original PDF.

12 articles

Articles discussing सुदंसणचरिउ

  1. सुदंसणचरिउ का साहित्यिक मूल्यांकन

    नयनंदि · Jain Vidya, 1987

  2. सुदंसणचरिउ में अलंकार-यौजना

    डॉ. गंगाराम · Jain Vidya, 1987

    “सुदंसणचरिउ में उपमा, उत्प्रेक्षा एवं उदाहरण प्रलंकार की तो भरमार है ही भन्य अलंकार भी यथास्थान प्रयुक्त हुए हैं”
  3. भारतीय भाषाओं में सुदर्शनचरित-विषयक साहित्य

    Jain Vidya, 1987

  4. सुदंसणचरिउ प्रयोजन की दृष्टि से

    Jain Vidya, 1987

  5. सुदंसणचरिउ के मूल्यात्मक प्रसंग - एक व्याकरणिक विश्लेषण

    डॉ. कमलचन्द सोगाणी · Jain Vidya, 1987

  6. सुदंसणचरिउ का छान्दस वैशिष्ट्य

    मुनि नयनन्दी · Jain Vidya, 1987

    “झपभ्रंश के काव्यों में प्रायः અનરો જી बहुत ही चामत्कारिक योजना प्राप्त होती है, किन्तु मुनि नयनन्दी (11 वीं शती) द्वारा विरचित भ्रपश्नंशकाव्य “सुदंसणचरिउ' में तो અન્યો की विपुलता श्रौर विविधता के साथ ही विस्मयकारी विचित्रता भी इष्टिगत होती है”
  7. सुदंसणचरिउ उदात्त की दृष्टि से

    डॉ. गदाधर सिंह · Jain Vidya, 1987

    “'सुदंसणचरिउ' को पढ़ लेने के बाद भारतीय संस्कृति का वह उदात्त रूप स्पष्ट होता है ।”
  8. इस अंक के सहयोगी रचनाकार

    डॉ. कमलचन्द सोगाणी, डॉ. गदाधर सिंह, डॉ. झादित्य प्रचण्डया 'बीति', डॉ. गंगाराम गग, डॉ. जयकुमार जैन, डॉ. दैवेन्दकुमार शास्त्री, डॉ. बरत सुरिदेव, भौ घौय · Jain Vidya, 1987

    “डॉ. कमलचन्द सोगाणी--बी. एससी., एम. ए., पीएच. डी. । प्रोफेसर, दशंनविभाग, ` सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर । इस श्रंक में प्रकाशित निबन्ध-1. सुदंसणचरिउ के मूल्यात्मक प्रसंग-एक व्याकरणिक विश्लेषण, 2. हेमचन्द्र”
  9. ध्रारम्भिक

    प्रो. प्रवीणचन्द्र जैन, मुनि नयनन्दी, डॉ. कमलचन्द्र सौगानी · Jain Vidya, 1987

  10. प्रकाशकीय

    Jain Vidya, 1987

  11. सुदंसणचरिउ का काव्यात्मक वैभव

    डॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री · Jain Vidya, 1987

  12. प्रारम्भिक

    प्रो. प्रवीणचन्द्र जैन · Jain Vidya, 1987