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Jain Darshans ka Anya Darshanon se Dvirdh Avdaan (Hindi)

By Sagarmal Jain

Vol. 342011pp. 77–85Hindi

Summary

यह लेख जैन दर्शन के उन विशिष्ट योगदानों का विश्लेषण करता है जिनसे अन्य भारतीय दार्शनिक परम्पराएँ समृद्ध हुईं। लेखक के अनुसार जैन विचारकों ने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्तवाद की अवधारणाओं को तंत्र, न्याय, वेदान्त और बौद्ध परम्पराओं में प्रतिपादित अनेक विचारधाराओं पर गहरा प्रभाव डाला है। जैन मत का मूल सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक वस्तु अनेक पक्षों से देखी जा सकती है; यह स्यादवाद की शिक्षाओं में प्रकट होता है, जहाँ किसी भी कथन की सत्यता सापेक्ष मानी जाती है। न्याय और वैशेषिक दर्शन ने जैन तर्कशास्त्र से परोक्ष रूप से प्रेरणा पाई और प्रमाणों के वर्गीकरण में इसकी बहुलतावादी दृष्टि को स्थान दिया। लेखक यह भी बताते हैं कि जैन धर्म ने अहिंसा को केवल व्यक्तिगत आचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी इसकी व्यावहारिकता सिद्ध की। महावीर और अन्य तीर्थंकरों की शिक्षाओं ने शंकराचार्य जैसे आचार्यों को भी समन्वय की ओर प्रेरित किया। लेख में उल्लेख किया गया है कि मध्यकालीन भारतीय समाज में जैन मुनियों ने वैदिक और बौद्ध पंडितों के साथ संवाद स्थापित किया; इस अन्तर्धार्मिक संवाद से शब्दार्थ विज्ञान, तर्कशास्त्र और नैतिक विचारधाराओं में समन्वय के अवसर उत्पन्न हुए। कई विद्वानों ने जैन सिद्धान्तों को ‘श्रद्धानुशीलन’ और ‘प्रमाणमीमांसा’ ग्रन्थों में स्थान दिया। लेखक का तर्क है कि जैन दर्शन की विशिष्टता इसकी उदारता और आलोचनात्मक दृष्टि में निहित है; यह न तो किसी एकांतवादी मानसिकता का पक्षधर है, न ही आस्थाविहीन संशयवाद का, बल्कि सत्य की बहुविधता को स्वीकारते हुए विचार‑मंथन को प्रोत्साहित करता है।

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Conclusion

लेख का निष्कर्ष है कि जैन दर्शन ने भारतीय बौद्धिक इतिहास में सेतु का कार्य किया। अपनी अहिंसक और बहुलतावादी दृष्टि से इसने विभिन्न दार्शनिक धाराओं के बीच संवाद स्थापित किया और विचारों की कठोरता को कम किया। आज भी अनेकान्तवाद और स्यादवाद हमें स्मरण कराते हैं कि किसी भी मुद्दे को समझने के लिए बहु‑आयामी दृष्टिकोण आवश्यक है।

Key passages

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  • “जैन जैन दार्शनिकों ने अन्य भारतीय दर्शनों को जो अवदान दिया है वह व्रिविध है”
  • “यद्यपि हरिभद्र के परवर्ती जैन दार्शनिकों में हेमचन्द्र, यशोविजय, आनन्दघन आदि अन्य धर्मों और दर्शनों के प्रति समभाव ओर उदारता का परिचय देते हैं, किन्तु उनकी यह उदारता उन पर हरिभद्र के प्रभाव को ही सूचित करती है ।”
  • “इस प्रकार हम देखते हैं कि दर्शन संग्राहक ग्रन्थों की रचना में भारतीय इतिहास में हरिभद्र ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने निष्पक्ष भाव से और पूरी प्रामाणिकता के साथ अपने ग्रन्थ में अन्य दर्शनों का विवरण दिया है।”

Works cited in this article

  1. सन्मतितर्क
  2. आप्त-मीमांसा
  3. द्वादशार नयचक्र
  4. षड्दर्शनसमुच्चय
  5. शाख्रवार्तासमुच्चय

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